शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

बकवास मत कर सार्थक लिख ताजगी और बदलाव के लिये : चर्चाकार (ललित शर्मा)


आज मुन्ना भाई ने सर्किट को भेज दिया और कहा कि ललित शर्मा को कह दो एक चर्चा हमारे ब्लाग पर भी होनी चाहिए, बताईये अब मरता क्या ना करता चलो रे भाई मुन्ना भाई का आदेश है मनाना ही पड़ेगा, पानी में रहके .......ठीक नहीं है, एक समाचार बता रहा हुई कि रायपुर कलेक्ट्रेट के कुत्तों से निगम कर्मचारी भयभीत हैं और उन्होंने कुत्तों से सेटिंग कर ली है. इसका पता तब चला मेयर मेडम ने उन्हें पकड़ने के लिए कहा. सख्त निर्देश पर भी कुत्ते नहीं पकडे गए. मेडम के असिस्टेंट को कुत्ते ने काट डाला तब मेडम ने कहा कि आस पास में कुत्ते नहीं अब नहीं दिखेंगे. अब जब भी मेडम के असिस्टेंट कलेक्ट्रेट जाते हैं तो उनको मुंह चिढाते हुए कुत्ते अठखेलियाँ करते है और लोग  पूछते हैं "क्या हुआ कुत्तों का? ये तो था एक समाचार अब मैं ललित शर्मा आपको ले चलता हूँ आज की चर्चा पर............
आज गिरिजेश राव जी फिर स्कुल जा रहे हैं और सब सहपाठियों से निवेदन कर रहे हैं कि स्कूल चले हम.भैया कालेज में कोई पढाई थोड़ी ना होती है पढ़ना है तो स्कुल जाना ही पड़ेगा और जो मजा स्कुल की पढाई में है वो कालेज की पढाई में कहाँ? हम सोच रहे हैं कि दो बार पांचवी पढ़ लेंगे तो १० क्लास की पढाई तो हो ही जाएगी अब किसी के पूछने पर नान मैट्रिक की डिग्री नहीं बतानी पढेगी सीधा ही मेट्रिक बताएँगे. इस लिए हम भी चलते हैं अब स्कुल. गिरिजेश भाई स्कुल पहुँच कर क्या कह रहे है देखिये."मैडम को सफेद अच्छा लगता है।"
अब आगे चलते हैं तो कुलवंत हैप्पी गुमशुदा की तलाश में निकल पड़े हैं लेकिन जिस चीज की तलाश में निकले हैं वह चीज बिना वैराग के नहीं मिलती चलो किसी दिन इस मायावी दुनिया से थक जायेंगे तो वैराग आ ही जाएगा और  अभीष्ट की प्राप्ति हो जाएगी, अब एक तरफ वैराग है तो दूसरी तरफ फागुनी विरह प्रकट हो रहा है.रानी विशाल जी फरमा रही है कि ना आये विरह की रैन.. तुम बिन सब सुख दुःख भये, ना पाए मन कहीं चैनप्राण जाए तो जाए पर, ना आए विरह की रैन, ये विरह ही ऐसी चीज है जो बहुत दुःख देती है
चलते हैं ३६ गढ़ की ओर जहाँ से महुए की भीनी भीनी,सोंधी-सोंधी खुशबु आ रही है और  शिल्पकार कह रहे हैं गजब कहर बरपा है महुए के मद का भाई.....यही समय जब महुआ के रस भरे फ़ूल जब धरती पर गिरते हैं तो इनकी खुशबु से पूरा वातावरण महक जाता है एक मादकता छा जाती है. फागुन आने का सन्देश सब तक पहुँच जाता है, हम भी महुआ के रस में तर हो गए हैं. आप भी कुछ तर होइए और फागुन का मजा लीजिये होरियारों के संग. इधर भी कुछ फागुन का ही माहौल बना हुया है,अब क्या कहिये काजल भाई पूछ रहे हैं कि सच बताना यह बस आपने कहीं देखी है. काजल भाई दिन भर हम मिथ्या व्यापर करते हैं और झूठ से फुर्सत मिलेगी तो कसम से सच भी कह देंगे आपकी बात जरुर रखेंगे काटेंगे नहीं.इतना वादा रहा हमारा.
ताऊ ने फिर पूछी है एक पहेली और उसका हिंट भी दे दिया है अब राम ही जाने कौन बनेगा विजता? इधर सतीश सक्सेना जी ताऊ की पोल खोलने में लगे हैं उनके सारे प्रोडक्ट को नकली बता रहे हैं लेकिन  मुझे समझ में नहीं आया कि जब सारे प्रोडक्ट नकली हैं तो क्रीम से समीर लाल कैसे गोरे हो गये? वैसे क्रीम तो चमत्कारी लगती है.बाकी सतीश जी बता रहे हैं.आप भी लीजिए आनंद.समीर लाल गोरे होए हैं और अवधिया जी लाल हो गए हैं. अब ये कैसे हो गया कौन सी क्रीम लगायी, क्रीम नहीं लगाई ये तो देखने से ही लाल हो गये, लाली मेरे लाल की जीत देखो उत लाल, लाली देखन मैं गई और मै भी हो गयी लाल, आज इन पर लालित्य छा गया है होली का,बहुत लाल-बाल हो गये हैं.
दिल्ली में चलना अब दिल्लगी नहीं रह गया है, इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता, अविनाश जी पहले पप्पू के साथ गाड़ियों की बहुत सवारी करते थे.लेकिन अब गर्दी देख के उनका भी मन सायकिल खरीदने की बजाय रिक्शा खरीदने का हो गया है. क्योंकि सायकिल पे तो दो लोग ही मुस्किल से बैठ सकते हैं और रिक्शे पर कई ओवरलोड होने से चालान का भी खतरा नहीं है, इधर एक खतरा टला नहीं की अनिल पांडे जी एक खतरा उठा रहे हैं और एक व्यथा बतला रहे हैं,अंतर सोहिल जी ने तो नामरूप अंतर जगा दिया, मुझे तो इनका नाम सामने आते ही अपूर्व आनंदाभुति होती है  जैसे भीषण गर्मी में किसी नीम के ठन्डे पेड की छाया, आज इन्होने चेताया  है कि बकवास मत कर, सार्थक लिख, अब आप सोच लीजिये क्या करना है?
परिकल्पना पर फगुनाहट की गुनगुनाहट है. आज अनुराग शर्मा जी की कविता प्रकाशित की गयी है. बहुत ही सुन्दर कविता है, बोल सियापति राजा रामचंद्र की जय, पवन सूत हनुमान की जय. अब हनुमान जी लंका में अशोक वाटिका में पहुँच गए हैं. लंका का दहन होगा. अवधिया जी की रामायण का प्रसंग है. संगीता पूरी जी ने अंधविश्वास के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और डटी हुयी हैं एक सैनिक की तरह मोर्चा लेने के लिए, रेखा श्रीवास्तव जी नारी का संबल बढा रही हैं और उन्हें कह रही है कि निर्बल मत बनो कर्म करो कुछ ऐसे कि सबल हो जाओ,
अरे भैया ये फकीरा भी कभी कभी गजब के रोल करते है. होली आई नहीं है और हाथ में दारू की बोतल लेकर शराबी का रोल कर रहे है. इधर परीक्षा सर पर आई है और  गोदियाल जी  वाह जी खुशवंत सिंग जी कह कर उन्हें शाबासी दे रहे हैं. मनोज जी बहुत ही मेहनत करते हैं. जब से इन्होने होली के कुछ चिट्ठों की चर्चा की है तब से ये भी होलिया गए है और कह रहे है होली आई रे
आज उडन तश्तरी रेस्ट पर है तो अदा जी उड़ान  पर हैं काव्य मञ्जूषा पर बहुत ही सुन्दर भाव भरी कविता है तथा ऊ छाता वाला फोटू भी बहुत सुन्दर लगा है कविता के साथ. इधर अजय झा कह रहे हैं तेरे बिना जी नहीं लगता, झा जी अगर हमारे लिए कह रहे हैं तो जल्दी ही मिलन होगा जब हिया मिलेगा तो जीया भी लगेगा.  सुबीर संवाद सेवा पे पढ़िए नजीर अकबराबादी का पूरा गीत "जब फागुनी रंग झमकते हों" फागुन का आनंद लीजिये डॉ.मनोज  मिश्र जी भी आज हमारे साथ महुआ के फेरा में पड़ गए हम तो महुआ-महुआ हुए, उनका भी मन होने लगा महुआ-महुआ, महुवे की खुशबु ही कुछ ऐसी है कि दीवाना बना देती है.
भैया अब इतना पढ़ने के बाद खुशदीप भाई मुस्कुराने कह रहे हैं जबकि हम चाहते हैं कि कविता का इनाम मिल जाये तो मुस्कुराएँ, क्योंकि जब से अनारकली कहीं चली गयी है हम मुस्कुराना ही भूल गए हैं. ताजगी और बदलाव के लिए  अब मै खुद को ही प्यार करने लगा, और चाहता हूँ कि इस थकान भरे दिन के बाद कोई थपकियाँ देकर सुला दे, प्रकृति का क्रूर प्रहार सही बहुत याद आओगे निर्मल तुम. आज फिर मेहनत से चिट्ठों के मोती पिरोकर एक माला बनायीं है. पसंद आये तो मुक्त कंठ से आशीर्वाद दीजिएगा. अब दे रहा हूँ इस चर्चा को विराम-सभी भाई-बहनों को ललित शर्मा का राम-राम........................!

14 टिप्पणियाँ:

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

वाह शर्माजी आपने तो आज इस ब्लाग पर आपकी प्रथम चर्चा जबरदस्त धमाके दार कर डाली. बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएं अपको मुन्नाभाई के साथ भी चर्चा करने के लिये.

रामराम

20 फ़रवरी 2010 को 9:06 pm
अजय कुमार झा ने कहा…

अहं सर्वव्यापी ....अहं ललित शर्मा ...हा हा हा हा ..जहां जाओगे मुझे पाओगे .....और पाओगे ढेर सारी पोस्टों की सौगात ...। सौगात पसंद आई ..आप आए हैं तो लगता है कि ....फ़ागुन आयो री सखी
अजय कुमार झा

20 फ़रवरी 2010 को 9:21 pm
संगीता पुरी ने कहा…

मुन्‍ना भाई से डरकर की .. फिर भी पूरे मन से हुई चिट्ठा चर्चा !!

20 फ़रवरी 2010 को 9:26 pm
HARI SHARMA ने कहा…

वैसे ये फ़ैसला कौन करेगा कि गली मे रहने का हक किसका है
जीवोक्रेसी का न्याय तो सह अस्तित्व की बात कहता है
बाकि आप जैसा बताये

20 फ़रवरी 2010 को 9:36 pm
ललित शर्मा ने कहा…

@ हरि शर्मा जी,
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दु:ख भाग् भवेत्।

20 फ़रवरी 2010 को 9:40 pm
Suman ने कहा…

nice

20 फ़रवरी 2010 को 10:07 pm
यशवन्त मेहता "फ़कीरा" ने कहा…

क्या मस्त चर्चा करी है
बहुत बढिया वर्णन और मजेदार तरीका

20 फ़रवरी 2010 को 10:13 pm
शरद कोकास ने कहा…

अरे..चर्चाकार ,अपुन सोच रेला था कि तू कोई कार - वार का चर्चा करेगा रे बाप ..तेरे नाम के के आगे चर्चाकार कायकू लगाया रे .. अब तू रायपुर का न्यूज़ सुना रेला है कि चर्चा कर रेला है अपुन को कुच समज मे ईच नई आता । दो-चार बिलाग का चर्चा करके तू अपने आप को चर्चा कार बोल रेला है अब्बी मुन्नाभाई को मालूम पड़ेगा तो खाली पीली में अपुन का वाट लगा देगा और मेरे कू बोलेगा तेरे को यैच बोला था क्या रे.. लगाउ क्या एक कान के नीचे . चर्चा करना है तो ठीक से कर नै तो निकल ले;

यह मै नही बोल रहा भाई.. अपुन को सर्किट बोला था कि ऐसा बोल देने का ..क्या ?
और ये कोन बोल रेला हे मस्त चर्चा करी है .. ये अंडाकरी समजा क्या रे कि मटन करी?

20 फ़रवरी 2010 को 10:26 pm
रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

बेहतर...

20 फ़रवरी 2010 को 10:42 pm
पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

शर्मा जी द्वारा बिना शर्म-संकोच के की गई फर्स्टक्लास चर्चा :)

20 फ़रवरी 2010 को 10:59 pm
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर चर्चा है जी, फागुन का रंग फिर भी कम आया।

20 फ़रवरी 2010 को 11:07 pm
सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

वह ललित भाई
चर्चा बर बने करे हस अपन दिमाग खरचा
दिमागे च हा तो ऐसे चीज आय जेला खर्चे
ले बाढ़थे, लोगन पढ़थें त काकरो गिरथे
त काकरो ठाढथे (उंखर पदवी ल कहत हौं )

21 फ़रवरी 2010 को 1:12 am
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आह ! इतना कैसे लिख लेते हो भई :)
सुंदर चर्चा

21 फ़रवरी 2010 को 4:40 pm
महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सुन्दर .. रंगोत्सव पर्व की अनेको हार्दिक शुभकामनाये ....

28 फ़रवरी 2010 को 7:39 pm

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