शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

येसेई केसे चर्चिया रिये हो सूरमा भोपाली? ब्लाग चर्चा..

आज के चर्चाकार : "सूरमा भोपाली"
अगले चर्चाकार : "ठनठनगोपाल बुंदेलखडी"

अरे आवो आवो सूरमा भाई …आज तुम इदर किदर कू टपक गयेला है बाप?

अरे मुन्ना भाई..मे तो येसेई आपकी मिजाजपुर्सी करने इदर आगया था खां…और क्या..

आवो आवो सूरमा भाई..बोलो चाय पिंयेंगा या काफ़ी पीने का?

अरे मुन्ना भाई..आप भी येसी केसी बात कर रिये हो मियां? अब हम कॊइ बच्चे तो हैं नई..जो चाय काफ़ी माफ़ी पियें..अरे मियां अगर आपकी मेहरवानी हो जाये तो आज हो जाये बाटली माटली…और क्या मियां..आज तो ठंड मंड बी भौत मजे की हो रई हे मियां…

अरे सूरमा भाई.अपुन ने आजकल बाटली माटली पीना कर दियेला है….क्या? अपुन का वास्ते सर्किट..मुन्नी मेंटेन देखने गयेला है..बस तबी से अपुन कसम खाया बीडू…अपुन बाटली को हाथईच नई लगायेगा…लो ये चाय आगयेला है..पीने का…और अपुन को ब्लाग चर्चा सुनाने का..

अरे मुन्ना भाई…ये कहां से आपने बिलाग मिलाग का शौक पाल लिया हे मियां..हम कहे देते हैं मियां..भौत खोटा शौक हे मियां ये…हम तो केते है मियां..पेली फ़ुरसत मे तौबा करो इस शौक से और अपने काम धंधे पे लगो मियां…

ए सूरमा भोपाली…अपुन बोल दियेला है..ज्यादा स्याणपत्ती नई करने का…क्या? नई तो तेरे कू बी अबी की अबी टपका डालेगा… क्या? बोलो टपकने का है क्या?

अरे मुन्ना भाई…आप बी क्या बात कर रिये हो मियां? अरे मे तो येसेई मजाक कर रिया था मियां…अरे मियां ये बिलाग मिलाग तो भौत अच्छी बात है हे मियां…इसका शौक पालने पर आदमी को सीधी जन्नत मिलती हे मियां..मे तो केता हूं मियां…बिलाग चर्चा सुनने का क्या …अल्लाह के फ़जल से आप तो खुद ई चौबीसों घंटो बिलाग लिखो मियां…लो अब आपको सुना रिया हूं असली बिलाग की चर्चा…..

मियां अरविंद मिश्राजी के रिये हें की

एक चतुर नायिका है विदग्धा! - वह नायिका जो प्रिय से मिलन /संपर्क की व्यवस्था अपनी पहल पर चतुराई से कर लेती है विदग्धा है ! यह वचन विदग्धा और क्रिया विदग्धा दोनों ही हो सकती है

और मियां ताऊ बोल रिया हे कि

ताऊ, करवा ले न्याय तेरे ब्लाग पंचों से ही.... !…हमने एक कहानी शुरु की थी सांड तो लड अलग भये : बछडे भये उदास शीर्षक से. जो क्रमश: पर जो छूटी तो आज तक छूटी हुई है. असल में ये रिपोर्टिंग का रोग ही कुछ ऐसा

और हिमांशु के रिये हें कि

क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर अन्तर (गीतांजलि का भावानुवाद) -

इस झंझावाती रजनी में स्नेहाविल यात्रा के सहचर
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर अन्तर ।

अरे सूरमा भाई आप तो भौत मजेदार भाषा बोल रयेले हो? बा ये किदर की भाषा बोल रयेले हैं आप?

अरे मुन्ना भाई में तो वेसेई भोपाली जबान बोल रिया हूं मियाम..लो भिया पान खालो..भौत मजे का हे…जय और विरू को बी खिलाया था मेने कसम से..हां तो अब आगे सुना रिया हुं..और खां…वो अविनाश जी मुंबई मे ब्लाग्र सम्मेलन की तैयारी कर रिये…हैंगे..

पहचानिये भी और अब 5 दिसम्‍बर को मुंबई में मिलेंगे (अविनाश वाचस्‍पति) -पहचानिये मेरे सिवाय हैं जो 4 दिसम्‍बर 2009 को चलूंगा मुंबई के लिए पहुंचूंगा 5 दिसम्‍बर को सुबह वहीं होगी उस दिन मेरी।

और खां….वत्स जी भविश्य बता रिये हैं भियाजी…सुन लो भौत मजे का हेगा…

ज्योतिष की सार्थकता मासिक राशिफल----दिसंबर 2009 - ** यह मासिक भविष्यफल जन्मराशि पर आधारित है । अत: सही फलादेश के लिए नामराशि की अपेक्षा अपनी जन्मराशि के अनुसार ही इसे पढें ।

और खां…लो सुनो ये राज भाटिया जी क्या के रिये हें?

गालिया केसी केसी......... -

हमारे भारत मै लोग जब आपस मै लडते है, तो हमेशा शुरुआत होती है सुंदर सुंदर गालियो से, ओर गालिया भी एक दुसरे को देते वक्त उन्हे सुंदर सुंदर शव्दो से सजा कर दे...

और मियां ये लो…पंकज मिश्रा जी बी लौटियाये और एक चर्चा कर डाली इमान से..सही के रिया हुं मुन्ना मियां…

कभी खुशी कभी गम !! चर्चा हिन्दी चिट्ठो की !!! -

नमस्कार , पंकज मिश्रा ..आपके साथ बीच मे लगभग बीस दिन आप सबसे दूर रहा..इसी बीच काफ़ी कुछ ब्लागजगत मे नया हो गया …..ताउ जी ने अपनी पहेली की पचासवी पोस्ट

और कोचीन वाले शाश्त्री जी भौत काम की बात बता रिये हैंगे…सुन लो मियां भौत काम की बात हे…

ज्ञान जी का प्रस्ताव और धन!

- मेरे कल के आलेख प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी! पर टिपियाते समय ज्ञानदत्त जी ने एक आश्चर्यजनक बात कह दी जो इस प्रकार है: मनुष्य समान बन नहीं सकता।

और मियां..ये तो शोले वाली फ़िल्म बना डाली सतीश पंचम भाई साहब…मियां भौत मजेदार बनी हे…पढी लो मियां..हंसते हंसते बावले ना हो जावो तो हमारा नाम बी सूरमा भोपाली येसेई नही है.

जब ब्लॉगर होने के कारण शादी न हो सके और जुडने वाला रिश्ता तोड दिया जाय...... -

- छी छी छी मौसी, वो और नशेडी......ना ना ...अरे वो तो बहुत अच्छा और नेक इंसान है। लेकिन मौसी एक बार जब कम्पूटर पर बैठ जाय तो फिर अच्छे बुरे का कहां होश रहता है, जो मन में आता है लिखता है, टिपियाता है, जिसको मन आए गरियाता है। अब कोई किसी का हाथ तो पकड नहीं सकता ना।

- ठीक कहते हो बेटा, ब्लॉगिंग का नशेडी वो, लती वो, उलूल जूलूल टिपियाये गरियाये वो.....लेकिन उसमें उसका कोई दोष नहीं है।

और खां…उडनतश्तरी जी के इरादे कुछ अच्छे नी लग रिये हैं मियां…

जूता विमर्श के बहाने : पुरुष चिन्तन..जूते खिलवाने की जुगाड कर रिये हैंगे मुन्ना भाई..भौत संभल कर रेना मियां..कसम से सही के रिया हूं…उडनतश्तरी के इरादे ठिक नी लग रिये हैं मिया…फ़िर मत केना कि मिजे बताया नी था…

pencil hill

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इनको क्या पहले खरीदना चाहिये-पार्टी ड्रेस फिर मैचिंग चप्पल और फिर पर्स या चप्पल, फिर मैचिंग ड्रेस फिर पर्स या या...लेकिन आजतक एक चप्पल को दो ड्रेस के साथ मैच होते नहीं देखा और नही पर्स को.

गनीमत है कि फैशन अभी वो नहीं आया है जब पार्टी के लिए मैचिंग वाला हसबैण्ड अलग से हो.

तब तो हम घर में बरतन मांजते ही नजर आते.

घर वाला एक आरामदायक हसबैण्ड और पार्टी वाले मैचिंग के बीस.

गम भरे प्यालों में,
दिखती है उसी की बन्दगी,

मौत ऐसी मिल सके
जैसी कि उसकी जिन्दगी.

और मियां काजलकुमार भाई के रिये हें कार्टून:- पप्पू की गन गुलेल और गोली भौत मजे का कार्टून हे मियां….और नीरज जाट कांगड़ा का किला – घुमा रिये हें…घूम लो मियां घर बेठे क्या बुरा हेगा?

कांगड़ा का किला - किला - जहाँ कभी एक सभ्यता बसती थी। आज वीरान पड़ा हुआ है। भारत में ऐसे गिने-चुने किले ही हैं, जहाँ आज भी जीवन बसा हुआ है, नहीं तो समय बदलने पर वैभवकिला - जहाँ कभी एक सभ्यता बसती थी। आज वीरान पड़ा हुआ है। भारत में ऐसे गिने-चुने किले ही हैं, जहाँ आज भी जीवन बसा हुआ है, नहीं तो समय बदलने पर वैभव

और निर्मला जी भौत अच्छी कहनी सुना रई हें..

वीर बहुटी

- गुरू मन्त्र **कहानी मदन लाल ध्यान ने संध्या को टेलिवीजन के सामने बैठी देख रहें हैं । कितनी दुबली हो गई है । सारी उम्र अभावों में काट ली, कभी उफ तक नही की । .

और मियां ये विवाह देखो…

सादगी से भरा बंगाली विवाह -

अभी 29 नवम्‍बर को एक विवाह में सम्मिलित होने भोपाल गए थे। समधियों के यहाँ लड़की की शादी थी। बारात बंगाली परिवार की थी। बारात शाम को पाँच बजे आने वाली थी

और गुनगुनाती धूप.. पर सरिता जी गीत सुनवा रई हैंगी अल्पनाजी तुम जो मिल गये हो[सरिता जी]…और शाश्त्री जी एक कविता सुना रिये हें "बहुत काम का है कम्प्यूटर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") – और मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति पर आपके ब्लॉग के दिन खराब होने के 10 लक्षण - 1. यह टिप्पणी प्राप्त होना कि "बहुत खूबसूरत रचना/ भावपूर्ण रचना/ Nice Post" जब आपको इस तरह की टिप्पणी प्राप्त हो तो इसका तात्पर्य यह है कि पढ़ने वाले के..मियां भौत मजेदार हे..खुद ई जाके पढने की सिफ़ारिश कर रिया हूं…जल्द जाके पढ लो..

और महेंद्र मिश्र जी समयचक्र पर

गुरूवार की छोटी सी चिट्ठी चर्चा... - नमस्कार मै महेन्द्र मिश्र...आज चिट्ठी चर्चा करने का दिन भाई *प्रमेन्द्र सिह*जी का है . आज अभी तक उनकी गुरूवार की चिट्ठी चर्चा का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार है.....

और $Alag sa पर गगन शर्मा जी…

लो, कर लो बात !! दुर्योधन का भी मन्दिर है भाई -

हमारे देश में सबसे बड़ा खलनायक माने जाने वाले रावण के समर्थकों का एक अच्छा खासा वर्ग है।

और अनवरत पर वकील साहब..भौत मजे की गप्प सुना रिये हें मियां…

"सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प" -

'शिवराम' बहुत बड़े लेखक हैं, नामी नाटककार हैं, उन के नाटकों के बहुत भाषाओं में अनुवाद हुए हैं, वे देश में और बाहर खेले गए हैं, वे समर्थ कवि भी हैं

काव्य मंजूषा….पर अदाजी भौत बेहतरीन गजल पढ रई हेंगी मियां..आप भि जाके बांच लो..मजा नी आये तो सूरमा भोपाली नाम नई अपना बी येसेई.

हम हक़ीक़त के हाथों यूँ मरते रहे बढ़ के पेड़ों से बेलें हटाते रहे -

ज़िन्दगी के लिए कुछ नए रास्ते हम बनाते रहे फिर मिटाते रहे
थी वहीँ वो खड़ी इक हंसीं ज़िन्दगी हम उससे मगर दूर जाते रहे
रात रोई थी मिल के गले चाँद से और अँधेरे अँधेरा बढ़ाते रहे
आँखें बुझने लगीं हैं चकोरी की अब दूर तारे खड़े मुस्कुराते रहे

और दिलीप कवठेकर जी भौत जोरदार पोस्ट है….

सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे

सचिन दा फ़िल्मों के चयन को लेकर बेहद चूज़ी थे. वे सिर्फ़ उन्ही के लिये संगीत देते थे जिन्हे संगीत की समझ थी.
गायक के चुनाव करते हुए भी वे उतने ही चूज़ी होते थे. सुना है, जिस दिन उनकी रेकॊर्डिन्ग होती थी, वे सुबह गायक से फोन से बात करते थे और बातचीत के दौरान पता लगा लेते थे कि उस दिन उस गायक या गायिका के स्वर की क्या गुणवत्ता है.एक बार किशोर दा के किसी पुराने नटखट गाने को सुबह कहीं रेडियो पर सुना, और एकदम फ़ोन घुमा दिया- किशोर, आज की रिकोर्डिंग में मुझे छिछोरा पन नहीं चलेगा... किशोर दा सोचते ही रह गये कि जितनी संजीदगी से उन्होने उस दर्द भरे गीत की रिहल्सल की थी, उसमें छिछोरापन कहां से दिख गया दादा को!!

अमीर धरती गरीब लोग अनिल भाई के रिये हें…

मैंने इससे पहले खुद को इतना बेबस और लाचार कभी नही पाया था! -

सारी रात खांसते-छिंकते बीती थी और बड़ी मुश्किल से सुबह सुबह नींद लगी थी कि मोबाईल ने घनघनाना शुरु कर दिया। लगातार बज़ रहे फ़ोन ने अज़ीब सी खीज़ पैदा कर दी थी

कल्पतरु पर विएवेक रस्तोगी के इरादे बी कूछ ठीक नी लग रिये मियां मेरे कूं तो…भाई जरा सावधान रेने का हे..मे आपकू पेले चेता रिया हूं…फ़िर मत केना के बताया नी था…

उत्तर भारतीय पत्नी Vs दक्षिण भारतीय पत्नी -

. वह तुम्हें बहुत सारा प्यार करेगी, और तुम कंगाल हो चुके होगे लम्बे समय से उसके आने वाले दहेज दे इंतजार में क्योंकि तब तक तुम उसे कितनी ही बार फ़िल्में दिखा चुके होगे और बाहर होटलों में खाना खिला चुके होगे।

शादी के लिये, उसे सिर पर चमेली का छोटा सा उद्यान होगा और मद्रास की गर्मी में भी असहज भाव से रेशमी साड़ियाँ पहने हुए पहनेगी। जबकि आप अपने एक कपड़े में गर्मी से परेशान हैं।

खेती बाडी पर अशोक पांडे जी बता रिये हें….

भोपाल गैस हादसा : कुछ शब्‍द, कुछ चित्र -

2-3 दिसं€बर 1984 की काली रात को हुआ भोपाल गैस कांड एक ऐसा सबक है, जिसे हमें हमेशा याद रखना चाहिए। इसलिए नहीं कि यह विश्‍व की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना है

और बबली जी GULDASTE - E – SHAYARI पर शायरी पढवा रई हें मियां…

किसीकी याद सताए तो क्या करें,
किसीसे मिलने को दिल चाहे तो क्या करें,
कहते हैं सभी, होती है मुलाकात सपनों में,
पर नींद ही न आए तो क्या करें !

ज्ञानवाणी वाणीगीत जी लिख रईं हैं…

मगर देर से बहुत ...... -

तलाश -ए -सुकून में भटका किया दर –बदर

दर पर मेरी भी आया मगर देर से बहुत .....

जागा किया तमाम

और भाई अपने छोटे मियां आदित्य चेलेंज दे रिये हैंगे.. पकड़ सकते हो!! – तो पकड के दिखावो…

ये मेरा पसंदीदा खेल है.. कभी बाबा के साथ तो कभी मम्मी के साथ.. खूब खेलते है पुरे जोश और मस्ती के साथ.. बाबा थक जाते है पर 'आची' नहीं.. २ मिनिट का ये वीडियो देखिए और बताइये आप पकड़ेगें मुझे.


Shri Tan Singh, Badmer
पर पढने का …

यहाँ ख़ुशी से खिलना -

यहाँ ख़ुशी से खिलना जीवन का यह दस्तूर है कहो कली क्या तुम्हे चटकना डाली पर मंजूर है क्या संचय का राज खुलेगा , पोशीदा जो बागों में जब धरती की कोख फलेगी ,

देशनामा पर 1957 और 2009 का फ़र्क...खुशदीप –बता रिये हें मियां…

आमिर और कैटरीना ने ये पोज़ सिने ब्लिटज मैगजीन की गोल्डन जुबली होने पर कवर के लिए खास तौर पर दिया...या यूं कहे कि इस पोज़ को गढ़ा गया...आमिर की प्रतिभा पर किसी को शक नहीं है...लेकिन मार्केट के लिए गढ़ा जाना आमिर की मजबूरी है...और गुरुदत्त जो करते थे वो खुद ही लोगों के दिल में गढ़ गया...बिना मल्टीप्लेक्स के अर्थशास्त्र के...


अन्तर सोहिल = Inner Beautiful
पर सुना रिये हैंगे…

आरजुओं का सारा जहां लुट गया -

आज किसी दोस्त किसी बिछडे दोस्त को याद कर लिया जाये। ठंडी छांव की ही नही कभी-कभी कडी धूप भी जरूरी होती है। कभी-कभी उदास भी हो लिया जाये। आज सुनिये एक दर्दीली..

एक लेटलतीफ़ की शादी – यानि ओम और श्वेता की बात रईं हें मीनू खरे जी…

वो मुझे 'मैम' कहकर सम्बोधित करता है क्यों कि ऑफिस में मैं उसकी बॉस हूँ और इस लिए भी क्यों कि वो मेरा शिष्य है.मैं उसे 'लेटलतीफ़' कहती हूँ, क्यों? अरे भई नाम से ही ज़ाहिर है कि वो हमेशा लेट आता है .किसी एक दिन, किसी एक मौक़े, किसी एक जगह पर नहीं, हर दिन हर मौक़े और हर जगह, हर कार्यक्रम में वो लेट आता है.कभी 15मिनट लेट तो कभी 45मिनट, कभी 1 घंटा लेट, कभी 2 घंटा और कभी कभी तो सुबह की जगह शाम को पहुँचता है.आपका काम रूके तो रूके पर उस बेचारे को समय से न पहुँचने की जैसे क़सम है.

ओम और श्वेता को स्नेहाशीष, आशीर्वाद और सुखमय जीवन की अशेष शुभकामनाएँ!

अरे सूरमा भाई…अपुन की बी बधाई दे डालने का ना ओम और स्वेता जी को…क्या?

अरे मियां मे तो पेले ई बधाई दे आया हूं..आप क्युं खाम्खाह परेशान हो रिये हो मियां…

और खां लविजा पूछ रई है कि… ह्म्म्म… ये किसका मोबाइल है ? -

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जब भी मोबाइल पर किसी की कॉल आती है, मेरा ध्यान सबसे पहले जाता है. और मुझे तो ये भी पता है की कौन सा मोबाइल किसका है. इसलिए जब भी मम्मी का मोबाइल बजता है मैं भाग कर उनका मोबाइल टेबल पर से उठाती हूँ और लाकर मम्मी को ही देती हूँ. चाहे कोई कितना भी मांगे मैं मम्मी के अलावा किसी को भी नहीं देती. और जब तरन्नुम आंटी के मोबाइल पर उनकी कॉल आती है तो उनको मोबाइल मैं उनको ही देती हूँ.

और खां…अंधड़ पर गोदियाल जी फ़िर से अंगरेजी की चार लाईन ठेल रिये हैं…और चलते चलते

और चलते-चलते यह भी गुनगुनाइएगा ;


My Photoहम बेवफ़ा तो पैदाइशी थे….!
हम बेवफ़ा पैदाइशी थे,
पर तुमसे वफ़ा करते रहे !
जानू, तुमने कोई धोखा तो नही दिया?
अरे नही जानम, तुम्हें कोई धोखा हुआ ।
कितनी अकेली रही होगी वो गोद जिसकी,
छत्र-छाया मे अब तक हम अकेले पलते रहे।
पैदा होते ही अपनी सगी मां से बेवफ़ाई की,
और सौतेली मां संग कंटीली राहों पे चलते रहे ॥
तुमने किया हमसे जो सिकवा
हम वो गिला करते रहे !
हम बेवफ़ा तो पैदाइशी थे,
पर तुमसे वफ़ा करते रहे

hileri-071231-fighter-pilot4 (1)

और खां उदर रामप्यारी और उडनतश्तरी मिल कर लोगोम को भौत पका रिये है…फ़र्रुखाबादी विजेता (132) : मुरारी पारीक -

नमस्कार बहनों और भाईयो. रामप्यारी पहेली कमेटी की तरफ़ से मैं समीरलाल "समीर" यानि कि "उडनतश्तरी" आज के फ़र्रुखाबादी विजेता का नाम घोषित करते हुये अपार हर्षि..

और खां अब मे भौत पक रिया हूं..और अब मे तो सीधा भोपाल निकल रिया मियां…सर्किट भाई आरिये होंगे..आगे की चर्चा आप उनसे सुनलेने…का मियां….

अरे खां..आप इत्ती देर से ये पढ रिये हो कि नई? तो खां बताओ ना केसी लगी ये सूरमा भोपाली की चर्चा..अरे खां..मेने तो बस येसेई पिनपिना दी ये चर्चा....फ़िर लौट के आरिया हूं जल्दी ई....

17 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा ने कहा…

मिया चर्चा तो बढिया ही रयी है,
को खाँ बड़ी जलदी चल दिये भोपाल।
पहले तो हम भी भोपाली होते थे,
बड़ा प्यारा लगता था भोजताल्॥

4 दिसंबर 2009 को 8:26 pm
जबलपुर-ब्रिगेड ने कहा…

गुरू जे का बात है भोपाल आ रिये हो
ब्रिगेड से मिलाने इधर आ जा जाओ तीन सौ किलो मीटर का अंतर है

4 दिसंबर 2009 को 8:32 pm
Vivek Rastogi ने कहा…

अरे खां किया के रिये हो, इतनी सारी पोस्टों की लिंक दे दी है कि पढ़े जा रिये हैं, बस ये अपने सूरमा भोपाली को कैना कि भोपाली सुप्रसिद्ध गालियां नी दे दे।

4 दिसंबर 2009 को 8:42 pm
संगीता पुरी ने कहा…

अपने मुन्‍ना भाई को आंवले का जेली खिलाने का न .. सर्दी में बहुत फायदेमंद है ये .. बाकी तो बढिया चर्चा रही .. बहुत सारे लिंक मिले !!

4 दिसंबर 2009 को 9:01 pm
Arvind Mishra ने कहा…

क्या खूब सिंहावलोकन -मगर मुझे अभी कई पोस्ट पढने हैं ! भागता हूँ मुन्ना भाई !

4 दिसंबर 2009 को 9:47 pm
हिमांशु । Himanshu ने कहा…

चर्चा का विस्तार और उसकी प्रस्तुति दोनों सुन्दर हैं । आभार ।

4 दिसंबर 2009 को 9:50 pm
makrand ने कहा…

एक्सीलेंट चर्चा सूरमा भाई, कसम से शमां बांध दिया. पर येसेई केसे चल दिये मियां बिना हमसे इजाजत लिये?

4 दिसंबर 2009 को 9:50 pm
makrand ने कहा…

अरे सूरमा भाई..ये ठनठन्गोपाल बुंदेलखण्डी क्या बुंदेलखंडी मे चर्चियायेंगे? मजा आजायेगा तब तो.

4 दिसंबर 2009 को 9:52 pm
Hiral ने कहा…

सूरमा भ्पाली साहब, आपकी चर्चा तो लाजवाब है ही, पर आपकी भाषा और शैली पढकर तो हंसी ही नही रुक रही है। क्या खूब स्क्रिप्ट लिखी है आपने. फ़ंटास्टिक...

4 दिसंबर 2009 को 9:57 pm
पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

अरे वाह्! शोले के सुरमा भोपाली यहाँ चिट्ठा चर्चा में मशगूल हैं...भई, बहुत बढिया लगा आपका ये अन्दाज !
एकदम लाजवाब्!

4 दिसंबर 2009 को 10:03 pm
'अदा' ने कहा…

युंकी...
ये हम क्या देख रहे हैं...??
अब देखने वाली बात ये है..कि चर्चा कौन रहा है...? तो चर्चा सूरमा भोपाली रहे हैं.... अब हमें बेफजूल बात करने कि आदत तो है नहीं .....अरे ये चिटठा चर्चा है किसी जमीदार कि बेगारी तो हैं नहीं कि मर्जी न मर्जी करनी ही होगी....हाँ तो सूरमा भाई.... अमाँ मियां.....भोपाल में बैठे हो क्या....मुन्ना-सर्किट को दो मिनट में अंदर कर आये.....या ब्लाग जगत के चार चक्कर लगवा कर टेसन पर छोड़ आये हो... क्यूँ कि आपका नाम सुरमा भोपाली एसए नहीं है न !!
युंकी ....आदमी आप अच्छे हैं और चर्चा की तारीफ भी नहीं करनी चाहिए....लेकिन अगर घोड़ा घास से दोस्ती कर ले तो खायेगा क्या....इसी लिए हम कहे देते हैं.....चर्चा झक्कास है.....बाप...!!

4 दिसंबर 2009 को 10:20 pm
अर्कजेश ने कहा…

तुमने भौत लम्‍बी चर्चा कर डाली मियॉं, कसम से !

4 दिसंबर 2009 को 10:34 pm
Udan Tashtari ने कहा…

ये लो सूरमा भाई भी चले आये भोपाली अदा लिए...बहुत बढ़िया/// अब तो ठनठन गोपाल का इन्तजार और जम से लग गया है भई...हमारे बुन्देलखण्ड के जो हैं. :)

5 दिसंबर 2009 को 12:44 am
पी.सी.गोदियाल ने कहा…

अरे मुन्ना भाई , इतने दिनों से गायब थे मैं तो सोच रहा था कि आइरेला- गई रेला तो नहीं हो गए अपने सर्किट चचा :)

5 दिसंबर 2009 को 9:32 am
Ashok Pandey ने कहा…

अच्‍छी चर्चा है। ढेर सारे चिट्ठों को समेटा गया है। चर्चा के लिए आभार।

5 दिसंबर 2009 को 4:44 pm
अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

badhiya charchiya diye hain...

7 दिसंबर 2009 को 12:50 am
खुशदीप सहगल ने कहा…

सूरमा भोपाली चार आने में जंगल खरीद कर निकल लिया और हमें खबर भी
नहीं हुई...वो मुन्नी मेंटेन को मनाने के फट्टे में भी उलझे रह गए मियां...मैं
तो कह रिया हूं मुन्ना भाई खुद ही तिहाड़़ जाकर पान खा लो पान,,,बड़ा मजे
का है भइया...

जय हिंद...

7 दिसंबर 2009 को 7:23 am

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